*कागज़ बेचता है*
कोई नाम बेचता है
कोई काम बेचता है
यहाँ सस्ते मे कोई
ईमान बेचता है...
देखो जिसे तुम
जहां में जहाँ भी
मक्कारी है मिश्रित
व्यहवहार बेचता है...
रिश्ते सजे हैं
यहाँ हर मकान में
पर सपने हों पूरे
स्वार्थ बेचता है...
करें क्या कुछ ऐसा
मिले नाम जग में
यहीं चाह लेकर
गर्मी में चंद कागज बेचता है...
बेचता है अपना श्रम
ले नाम ईश्वर का
दो रोटी की खातिर
वो इंसान कागज बेचता है...
आजादी के नाम
सजी हैं दुकानें
दुकानों पे राष्ट्र का
सम्मान बेचता है...
महा दान शिक्षा
कहते सभी है
फिर भी एक शिक्षक
ज्ञान बेचता है....
भुख से व्याकुल
गुजरता है जीवन
उस जीवन की खातिर
कागज बेचता है...!
– मस्तानी


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