*मेरी कहानी*
जब छोटी सी बच्ची थी माँ की उंगली छूट गई,
मुझे छोड़ वो उस भगवान के पास चली गई...
वो दौर भी गुज़र गया जब माँ की ममता मुझसे छिन गई,
मैं फिर अपनी तन्हाई में अकेली सी गुमनाम होती चली गई...
पिता को नही थी फुरसत एक पल भी साथ बिताने को,
बस एक टूटी सी गुड़िया बची थी सब हाल सुनाने को...
वो दौर भी गुज़र गया कुछ ऐसे ही सहके दर्द थोड़ा,
पर जिंदगी में तक़लीफ़ों ने हमारा साथ ही न छोड़ा...
दीदी संग बतिया अपना हाल सुना अपना मन बहला लिया,
किस्मत को वो भी मंजूर न हुआ उन्हें भी अपने पास बुला लिया...
दुनिया की भीड़ में हम ऐसे ही दर्द सहते सहते खो गए
जिम्मेदारियाँ निभाना हमें आ गया जाने कब हम बड़े हो गए...
कब हम मुस्कुरा कर खिलखिलाए थे पता ही न चला
वो दौर कैसे कब और कहाँ गुज़र गया पता ही न चला...
दर्द का मंजर कुछ ऐसे ही सहा हमने ये ज़माना क्या जाने?
वो दौर कैसे गुज़रा रूह का क़त्ल कर भला कोई क्या जाने?
– मस्तानी .. ✍✍


सत्य को बेहतरीन ढंग से चरितार्थ किया है 👏👏👏
ReplyDeleteबेहतरीन शब्दो को सजाया है💐
ReplyDeleteबेहतरीन शब्दो को सजाया है💐
ReplyDeleteबहुत खूब
ReplyDeleteदिल को छु देने वाली रचना है
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